महाकाल मंदिर
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महाकाल मंदिर :
यह प्रसिद्ध मंदिर भारत के १२ ज्योतिलिंगों में से एक है। इसका निर्माण काल की निश्चित जानकारी नहीं मिलती। कहा जाता है कि गुप्त सम्राट विक्रमादित्य ने ही इसे बनवाया था। यहाँ प्रति वर्ष भारी संख्या मे श्रद्धालु आते हैं। सिंहस्थ मेला यहाँ १२ वर्ष में एक बार लगता है।
पहले इस मंदिर का शिखर सोने का था, जो मीलों दूर से भी दिख जाता था। ११ वीं सदी में जब यह जीर्ण होने लगा, तब राजा भोज ने इसकी मरम्मत करवाई थी। लेकिन बाद में मंदिर ने कई बार मुस्लिम आक्रमणकारियों का सामना किया। सन् १२३५ में दिल्ली के सुल्तान शमसुद्दीन इल्तुतमिश ने मालवा जीतने के बाद इस मंदिर को तुड़वा डाला, महाकाल का लिंग पास के कोटि तीर्थ में फिकवा डाला तथा अनेक स्वर्ण- मूर्तियों को अपने साथ लेकर चला गया। ५०० वर्षों तक महाकाल का पता नहीं चला। इस मंदिर पर लोगों का विश्वास हमेशा बना रहा। प्राचीन मंदिर के खंडहर अब भी विद्यमान हैं। इसे "बूंदे महाकाल' के रुप में जाना जाता है।
वर्तमान मंदिर जो १८ वीं सदी में बना है, मंदिर के ही पुराने स्थल के निकट ही स्थित इसे ग्वालियर राज्य के संस्थापक रानोजी सिंधिया के दिवान रामचंद्र बाबा ने बनवाया था।